जय मात्रभाषा
कोई भी व्यक्ति जब भी कुछ सीखता है तो वह अपनी मात्रभाषा में ही सीखता है,भले ही वह धीरे-धीरे किसी अन्य भाषा का जानकार हो जाए और कुछ भी उस अन्य भाषा मे पढ़ ले समझ ले परंतु वह उस चीज के बारे मे उसे समझने के लिए कुछ भी सोंचता है तो अपनी भाषा मे सोंचता है, अतः व्यक्ति किसी दूसरी भाषा का कितना बड़ा जानकार क्यों ना हो जाए परंतु वह उस भाषा में सोंच नही सकता,
अतः मात्रभाषा ही व्यक्ति को सीखने समझने योग्य बनाती है परंतु जिस भाषा के सहारे हमने दूसरी किसी भाषा को सीखा हम उसी भाषा को नज़रअंदाज कर देते हैं और उपेक्षित भी करते हैं जिसका परिणाम यह होता है की हम अपनी मात्रभाषा से विमुख हो जाते हैं यह कितना अपराध है की हमने जो कुछ भी सीखा अपनी मात्रभाषा के कारण सीखा परंतु दूसरी भाषा के चंद शब्दों का ग्यान होते ही हम उसे भूल गये बल्कि वह हमारे लिए निम्नस्तरीय भाषा भी हो गयी......... आज हमारी स्थति तो उस महा गरीब व्यक्ति की तरह है जिसके पास अपनी ज़बान ही नही है |
हम अंग्रेजी सीखते हैं तो उससे पहले हिन्दी सीखते हैं अतः हमारे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण और आदरणीय हिन्दी है, परंतु आज हम अंग्रेजियत मे रंगकर मात्रभाषा को भूलते जेया रहे हैं फलतः हममे से कोई भी ना तो रामानुजन जन्म लेता है और ना ही सी0वी0रमन, हम राधकरष्णन और राजेन्द्र प्रसाद मदन मोहन मालवीय जैसी विभूतियों को आस पास देखना तो चाहते हैं परंतु वो बीज हम लोग बच्चों को उनकी मात्रभाषा से दूर कर खत्म कर रहे हैं |
अगर हम यह सोंचते हैं की अंग्रेजी के बिना प्रगती असंभव है तो कोरिया अरब जर्मनी यूनान जैसे देश क्यों प्रगती-पथ पर बढ़ रहे हैं |मात्रभाषा की ओर बढ़ती असम्वेदना शर्म से डूब मरने का विषय है,क्योंकि व्यक्ति के ग्यान के व्रक्ष की जड़ें उसकी मात्रभाषा की भूमि मे ही स्थित होती हैं.......हमे भारतेंदु हरिश्चन्द्र जी के इस संदेश को नही भूलना चाहिए..........
निज भाषा उन्नति अहे,सभी ग्यान को मूल |
बिन निज भाषा ग्यान के ,मिटत न हिय को शूल ||
No comments:
Post a Comment